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Motion of thanks on President’s Address Speech

श्री जयंत चौधरी (मथुरा) : मैं अपने दल की ओर से महामहिम राष्ट्रपति जी के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूं। राष्ट्रपति जी ने अपने अभिभाषण में काफी महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर चर्चा की। मौजूदा भूमि अधिग्रहण कानून का चरित्र मूलतः औपनिवेशिक है। 1894 में इंग्लैण्ड के व्यापारिक हितों को साधने के लिए ईस्ट इंडिया कम्पनी ने भूमि अधिग्रहण कानून की शुरूआत की थी। आजादी के बाद उस कानून में समय-समय पर संशोधन होते रहे। किन्तु आज केन्द्र और राज्य सरकारें इस कानून का जिस तरह इस्तेमाल कर रही हैं उसके नतीजे ईस्ट इंडिया कम्पनी की अपेक्षा जनता के लिए अधिक भयावह रूप में सामने आ रहे हैं। भूमि अधिग्रहण सार्वजनिक हितों के लिए आमतौर पर सड़क, अस्पताल, स्कूल अथवा सरकारी कार्यालय की इमारतें बनाने के लिए किया जाय। जहाँ तक किसी औद्योगिक मिल या कारखाने के लिए भूमि अधिग्रहण का प्रश्न है तो वहां पर भी उद्योगपतियों को भूमि किसानों से सीधे लेनी चाहिए। इसमें सरकार का दखल कहां तक उचित है? आज स्थानीय आबादी जिसे अधिग्रहण के चलते भूमि से बेदखल किया जाता है, उसका कोई भविष्य नहीं होता। प्रभावित किसानों और मजदूरों को अधिग्रहीत भूमि पर लगने वाले उद्योगों में रोजगार मिलने की सम्भावना लगभग न के बराबर होती है, इसी का नतीजा है कि आज भारत में करोड़पत्तियों की संख्या में वृद्धि हुई है, कुछ गिने-चुने लोग खरबपति हुए हैं, तो ऐसे लोग करोड़ों की संख्या में हैं जिनके पास दो जून की रोटी भी नहीं है। इस तरह हमारा समाज एक असंतुलित विकास का शिकार हो रहा है। पिछले 15 वर्षों में बड़े-बड़े उद्योगों में श्रमिकों की संख्या लगातार घटी है पर उनका मुनाफा तेजी से बढ़ा है।

यहां मुझे चौधरी चरण सिंह जी के वो उद्गार याद आते हैं जो उन्होंने 1959 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में सहकारी खेती के विरोध में व्यक्त किये थे। उन्होंने कहा था किकिसान अपनी जमीन को माँ की तरह प्यार करता है। भूमि का एक छोटा सा टुकड़ा भी उसके लिए सम्मान की वस्तु होता है। वा जान दे सकता जमीन नहीं। किसान और भूमि के बीच क्या रिश्ता है, यह हमें समझना होगा।

दिल्ली एयरपोर्ट के लिए 1972 में महिपालपुर समालखा आदि गांवों की जमीनों की भूमि को अधिग्रहण किया गया था, प्रति एकड़ 5500 रू0 का मुआवजा मिला था और आज वहीं जमीन व्यवसायियों को होटल आदि के लिए महंगे दामों पर दी जा रही है। किसानों की भूमि जब ली जाती है तो उसका मूल्य कम होता है और अधिग्रहण करने के बाद उसका मूल्य एकाएक बढ़ जाता है, ऐसा क्यों होता है? महोदया 21 जुलाई, 2009 को यमुना एक्सप्रेस-वे की अधिसूचना जारी की गयी थी। इसके अन्तर्गत 850 गांवों को अधिसूचित कर दिया गया है तथा यमुना एक्सप्रेस वे आज 90 प्रतिशत सिंचित और उपजाऊ भूमि पर बनाया जा रहा है। आज उ0प्र0 के 107452 गांवों में 5 से 6 हजार तक गांव अधिसूचित कर दिये गये हैं वो भी पिछले 2-3 वर्षों में। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार कृषि भूमि 1980-81 में 185 मिलियन हेक्टेयर थी और 2005-06 में 182.57 मिलियन हेक्टेयर रह गयी है मैं यहाँ यह बताना चाहूँगा कि अंततः रोटी सिर्फ खेती ही दे सकती है। हम इतनी बड़ी जनसंख्या का पेट अनाज आयात करके नहीं भर सकते। फिर अन्न आयात करने के भी अपने खतरें हैं। हम फार्मूला वन रेस, गोल्फ तथा महंगी गाड़ियों के बिना तो रह सकते हैं, पर बिना अन्न के नहीं।
भूमि अधिग्रहण कानून 1894 के सैक्सन-17 में Urgency clause का भी दुरुपयोग हो रहा है। आज उत्तर प्रदेश के कितने ही इंडस्टियल पार्क तथा रिहायशी इलाकों के लिए कितनी ही भूमि अधिग्रहीत कर ली गयी है, पर बीस साल के बाद भी वहां पर कुछ भी नहीं हुआ। जिन बड़े-बड़े उद्योगतियों को किसानों की उपजाऊ जमीनें विशेष आर्थिक क्षेत्रों के नाम पर दी जा रही हैं उनका उद्योग लगाने के कितना इस्तेमाल किया जा रहा है, उससे रोजगार का कितना सृजन हो रहा है, यह भी मानने की बात है। महोदया, सादाबाद विधानसभा क्षेत्र में 1400 एकड़-भूमि अधिग्रहण की गयी थी और वहां पर केवल एक एलपीजी प्लांट लगा हुआ है।

आज इस बात की जरूरत है कि एक ऐसी राष्ट्रीय नीति बनाई जाये, जिसके तहत यह सुनिश्चित किया जाये कि किस तरह की भूमि उद्योगों तथा एक्सप्रेस-वे जैसी परियोजनाओं के लिए अधिग्रहीत की जायेगी तथा कौन सी भूमि अधिग्रहण से मुक्त रखी जायेगी। आज गंगा-यमुना के मैदान में विशेष आर्थिक क्षेत्रों (एसइजेड) और एक्सप्रेस-वे के नाम पर जिस तरह खेती की उर्वर भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है, वह एक आत्मघाती कदम है। इसके दो भयावह परिणाम हमारे सामने आ रहे हैं ः एक तो अपनी भूमि से बेदखल होकर किसान मूजदूरों के रूप में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं और बेरोजगारी के आंकड़ों में लगातार वृद्धि कर रहे हैं, दूसरे उपजाऊ कृषि भूमि का अधिग्रहण खाद्यान्न के उत्पादन को प्रभावित कर रहा है। विशेष आर्थिक क्षेत्रों एवं एक्सप्रेस-वे परियोजनाओं के नाम पर कृषि भूमि का जिसतरह अधिग्रहण किया जा रहा है उससे हमारे सामने भविष्य में खाद्यान्न का संकट पैदा होने की आशंका बढ़ रही है। ऐसे में भारी मात्रा में कृषि भूमि के अधिग्रहण के बाद खाद्यान्नों की उपलब्धता की स्थिति और भयावह हो जायेगी। महोदया, आज भारत की महती आवश्यकता है कि हम अपनी फूड सिक्यारिटी सुनिश्चित करें। सरकार न्यूक्लीयर लायबिलिटी एक्अ को लाने के लिए तो चिंतित है परन्तु किसानों और मजदूरों से संबंधित भूमि अधिग्रहण पर संवेदनशील नहीं है।


इस देश का किसान मिट्टी में पैदा होता है, मिट्टी में ही पलता बढ़ता है और समाज के अन्य तबकों का पेट भरते हुए अंत में मिट्टी में ही मिल जाता है किन्तु यदि उसके शोषण का कुचक्र जारी रहता है तो वह शोषक को भी मिट्टी में मिला देता है। इसलिए भूमि अधिग्रहण की इन अन्यायपूर्ण नीतियों के नाम पर किसान का ये शोषण रुकना चाहिये अन्यथा हमें राष्ट्रकवि दिनकर की इन पंक्तियों को एक दिन घटित होते हुए देखना होगा-


जब कभी अन्याय का, अपकर्ष का घट फूटता है

तब मनुज ले प्राण हाथों पर, दनुज पर टूटता है

जब अन्याय और शोषण की सीमाएं टूट जाती हैं तो कमजोर मनुष्य भी अपने से कई गुना शक्तिशाली पर प्रतिरोध के लिए टूट पड़ता है।

आज की जरूरत है कि हम पुराने भूमि अधिग्रहण कानून को रद्द करके नया कानून बनायें, जिससे कि कृषि भूमि, किसानों और मजदूरों के हितों को संरक्षण मिल सके।

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